मंगलवार, 19 जून 2012

राष्ट्र अद्धयायी !

राष्ट्र का अर्थ होता है ......................................................... धर्म के दो प्रकार होते हैं एक वो "जो हमारा सास्वत धर्म है" और एक है "आध्यात्म " एक का सम्बन्ध लौकिक घटाओं या तत्वों से होता है, और दुसरे का सम्बन्ध आलौकिक शक्तियों से होता है,
निश्चित रूप से हमें यहाँ केवल लौकिक या केवल आलौकिक धर्म में से किसी एक पर विचार नहीं करना चाहिए, वल्कि दोनों पर विचार करना चाहिए क्योंकि दोनों ही मानव जीवन की रीढ़ हैं,एक के बिना जीवित नहीं रह सकते और दुसरे के बिना मरना संभव नहीं है.
हमें पक्ष या विपक्ष की बाते न सोचते हुए केवल धर्म के दोनों स्वरूपों की बात करनी चाहिए,और इसमें भी हमें सर्व प्रथम धर्म के लौकिक पक्ष की ही बात करनी चाहिए:---
तो धरम का लौकिक पक्ष है "अर्थशाश्त्र " अर्थात "राजनीति" भारत वर्ष के किसी भी ग्रन्थ में जो वास्तव में राजनीति से सम्बंधित रहा है,उसमे कभी सत्ता या शासन को राजनीति से नहीं जोड़ा गया है,क्योंकि यहाँ राज्य या राजा की नीति को कभी प्रमुखता नहीं दी गयी वल्कि राजतन्त्र में भी जनता के सुख एवं सुविधा के लिए ही सदैव व्यवस्था बनाने का प्रयास किया गया,इसीलिए भारत में "राजनीति" को "अर्थशाश्त्र" ही कहा गया अर्थात ऐसा शाश्त्र जो जीवन की प्रतियेक
आवश्यकता,समस्या,जटिलता,सुख-सुविधा,और संकट के हल के लिए एक "अर्थ या उत्तर" प्रदान करता हो.
राजनीति को सत्ता अर्थात रजा या राज्य की नीति कह सकते हैं,इसको जनता की नीति नहीं कह सकते,अगर ऐसा होता तो इसको जन-नीति कहा जाता और सत्ता के साथ राजनीति नामक ये शब्द कभी प्रादुर्भाव में नहीं आता,ये राजिनी नामक शब्द पश्चिमी देशों से भारत या अन्य और देशों में आया है,और इसी ने भारत सहित अन्य कई देशों की सत्ता एवं शासन पद्धति को विकृत करके उसे जन-नीति के स्थान पर नेता नीति या राजनीति बना दिया,जिसमे जनता को इसके सड़ने का अहसास हो रहा है,फलस्वरूप जनता संसार के कई हिस्सों में सत्ता एवं शासन में जन-नीति की स्थापना के लिए लगातार छटपटा रही है,और अनेक देशों में आन्दोलन हो रहें है.
तो मानव के धर्म की बात की जाये तो मानव धर्म पूरी तरह से लौकिक होता है और उसका ईश्वर की आराधना या आध्यात्म से दूर दूर तक कोई सम्बन्ध नहीं होता है ! मानव-मानव के काम आये,उसके सुख-दुःख का ध्यान रखे,"वसुधैव कुटुम्बकम" की मूल भारतीय और मानवीय भावना के साथ सभी के विकास और उन्नति के लिए प्रयास करता रहे. यही मानव का मूल धर्म है जो धर्म के आध्यात्मिक पक्ष से बिलकुल अलग है.
लेकिन इस मानवीय धर्म की जगह केवल सत्ता और शासन को राज्य या शासक की नीति के रूप में "जिसको आज-कल राजनीति" भी कहा जाता है जनता के सामने रख दिया गया है,और हमको बिकल्प हीनता और शुन्य नेतृत्व वाले कमजोर शासन और सत्ता को अपने ऊपर शासन करते देखना पड़ रहा है.
सत्ता केवल एक बात पर विशेष ध्यान दे रही है कि किस प्रकार धर्म के मानवीय पक्ष को कुचल दिया जाये,और अपनी पूरी उर्जा केवल धर्म के सभी स्वरूपों को समाप्त करने में लगा रही है,न कि मानव के,राष्ट्र के या जनता के विकास,उन्नति,या उसके कल्याण के लिए.
हमें अगर व्यवस्था परिवर्तन करना है तो सबसे पहले यह समझाना होगा कि धर्म और सत्ता,दोनों ही एक मानव मस्तिष्क की विचार रुपी माता के गर्भ से उत्पन्न हैं,और दोनों में से किसी को भी समाप्त नहीं किया जा सकता हा,अगर कोई ऐसा प्रयास कर रहा है तो ऐसे व्यक्ति,संस्था या सत्ता का विनाश निश्चित संभव है....
"राष्ट्र-अद्धयायी"

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें