मंगलवार, 15 दिसंबर 2009

राष्ट्र अद्धयायी!

२:--
     संकल्पना प्रथम संस्था जो की राष्ट्र है,की जन्म दात्री है,...साथ-साथ संकल्पना ही धर्म रुपी महान एवं उस पवित्र संस्था की भी जन्म दात्री है जो आलौकिक एवं ईश्वरीय सत्ता की प्रतीक है,अर्थात संकल्पना ही धर्म रुपी उस पवित्र और आलौकिक तत्त्व की भी जन्म दात्री है जो मानव की मानसिक एवं वैचारिक शान्ति का मार्ग प्रशस्त करता है!जैसे राष्ट्र मानव को लौकिक संकटों एवं आपदाओं से रक्षित करता है,वैसे ही धर्म मानव की आलौकिक एवं दैवी संकटों तथा आपदाओं से रक्षा करता है!
           संकल्पना रुपी माता के ये दोनों पुत्र वास्तव में एक दूसरे के संस्थापक और रक्षक भी है,प्राचीन काल से ही न्यायप्रणालियों तथा    राज्यव्यवस्थाओं  राष्ट्र और धर्म मुख्या तत्त्व रहें हैं!जो एक दूसरे के सहायक ,सहयोगी तथा पूरक रहें हैं!राष्ट्र की सुरक्षा मानव का मुख्य धर्म है तो साथ ही धर्म की सुरक्षा भी मानव द्वारा रक्षित राष्ट्र का प्रथम कर्तव्य है!.
           वर्तमान विश्व में  न्यायप्रणालियों तथा  राज्यव्यवस्थाओं  राष्ट्रवाद और राष्ट्रों तथा धर्म और आध्यात्म पर एक साथ एक सामान संकट उत्पन्न हुआ है.यह संकट धर्म और राष्ट्र की नकारात्मक तथा विकृत व्याख्याओं द्वारा खड़ा किया गया है!आज ना तो राष्ट्र ही राष्ट्र की तरह व्यवहार कर रहे हैं और ना ही धर्म ही अपनी सीमाओं और मर्यादाओं में रह गए हैं,वल्कि ये तो एक दूसरे का विनाश और उल्लंघन करने पर तुले हुए हैं,  राष्ट्र और सत्ता, धर्म को आज अपने पैरों तले रौंदना चाहते हैं!वहीँ धर्म और आध्यात्म तथा राष्ट्रवाद की अनुचित व्याख्या करके कुछ अवांछित  तत्त्व आज सत्ता व  राष्ट्र को तोड़ना चाहते   हैं,यह स्थिति अब अत्यंत विनाशकारी  और विस्फोटक हो गयी  है ,जिसको वर्तमान में आतंकवाद का नाम दिया गया है!.

राष्ट्र अद्धयायी !

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     संकल्पना प्रथम संस्था जो की राष्ट्र है,की जन्म दात्री है,...साथ-साथ संकल्पना ही धर्म रुपी महान एवं उस पवित्र संस्था की भी जन्म दात्री है जो आलौकिक एवं ईश्वरीय सत्ता की प्रतीक है,अर्थात संकल्पना ही धर्म रुपी उस पवित्र और आलौकिक तत्त्व की भी जन्म दात्री है जो मानव की मानसिक एवं वैचारिक शान्ति का मार्ग प्रशस्त करता है!जैसे राष्ट्र मानव को लौकिक संकटों एवं आपदाओं से रक्षित करता है,वैसे ही धर्म मानव की आलौकिक एवं दैवी संकटों तथा आपदाओं से रक्षा करता है!
           संकल्पना रुपी माता के ये दोनों पुत्र वास्तव में एक दूसरे के संस्थापक और रक्षक भी है,प्राचीन काल से ही न्यायप्रणालियों तथा    राज्यव्यवस्थाओं  राष्ट्र और धर्म मुख्या तत्त्व रहें हैं!जो एक दूसरे के सहायक ,सहयोगी तथा पूरक रहें हैं!राष्ट्र की सुरक्षा मानव का मुख्य धर्म है तो साथ ही धर्म की सुरक्षा भी मानव द्वारा रक्षित राष्ट्र का प्रथम कर्तव्य है!.
           वर्तमान विश्व में  न्यायप्रणालियों तथा  राज्यव्यवस्थाओं  राष्ट्रवाद और राष्ट्रों तथा धर्म और आध्यात्म पर एक साथ एक सामान संकट उत्पन्न हुआ है.यह संकट धर्म और राष्ट्र की नकारात्मक तथा विकृत व्याख्याओं द्वारा खड़ा किया गया है!आज ना तो राष्ट्र ही राष्ट्र की तरह व्यवहार कर रहे हैं और ना ही धर्म ही अपनी सीमाओं और मर्यादाओं में रह गए हैं,वल्कि ये तो एक दूसरे का विनाश और उल्लंघन करने पर तुले हुए हैं,  राष्ट्र और सत्ता, धर्म को आज अपने पैरों तले रौंदना चाहते हैं!वहीँ धर्म और आध्यात्म तथा राष्ट्रवाद की अनुचित व्याख्या करके कुछ अवांछित  तत्त्व आज सत्ता व  राष्ट्र को तोड़ना चाहते   हैं,यह स्थिति अब अत्यंत विनाशकारी  और विस्फोटक हो गयी  है ,जिसको वर्तमान में आतंकवाद का नाम दिया गया है!.