श्री महेंद्र श्रीवास्तव जी आपका आलेख हमने पढ़ा, इसमें जवाब देने लायक हालाँकि कुछ नहीं है,लेकिन फिर भी मन में आपकी बातों से पीधन हुई तो कुछ लिखना मेरा परम कर्तव्य है,..जहां तक बात संत की है वो ना तो आर्य समाजी होता है और ना ही सनातनी , संत कवक संत होता है और आर्य समाज का मूल आधार जो की वेद हैं उसमे स्पष्ट लिखा है कि हमारे यहाँ आश्रम व्यवस्था के अंतर्गत संन्यास एक जीवन जीने का मार्ग है और ये व्यवस्था आर्यसमाजिक व्यवस्था से बहुत पहले की वैदिक कालीन व्यवस्था है,आर्य सामाजिक व्यवस्था 200 वर्षों से भी नवीन व्यवस्था है ,क्या आपको लगता है की संन्यास और भारत में साधू - संत के लिए बनाई गयी व्यवस्था केवल 200 वर्ष या उसे कम पुरानी है,ज्यादा लिखने की आवश्यकता है नहीं,वस इतना ही पर्याप्त है की आपको केवल भारत की सभ्यता और संस्कृति को ठीक से अध्ययन करना चाहिए,तथा सबसे आवश्यक सलाह ये है की आज कल भारतीय मीडिया के बारे में लोगों में बहुत गुस्सा है उसे ठीक से देखें और पहचानने का प्रयास करिए, मेरा ये निवेदन सभी मीडिया के भाइयों से है,ना की केवल आपसे ,क्योंकि भारत में विकास,सत्य,और न्याय के लिए लड़ने हेतु मीडिया का कुछ वर्षों पहले तक बहुत महत्वपूर्ण स्थान था जो की आज मीडिया खो चुका है,जिसको आप सार्वजानिक जीवन में भली - भांति जानते हैं,और अगर विश्वास ना हो तो एक राष्ट्र व्यापी सर्वे करवा लीजिये जिसमे आम लोग आपके साथ सर्वे टीम में शामिल हों,आपको जनता के उस गुस्से का अहसास हो जायेगा,जिसका आपको आभास तो है मगर अभी उसके विनाशक परिणामों से आप भली - भांति परिचित नहीं है,जिसका उत्तर आपको केवल काल चक्र ही देगा,क्योंकि समय बहुत मूल्यवान और शक्तिशाली होता है जो बड़ी से बड़ी शक्तियों को समूल नष्ट कर देता है,आज मीडिया एक बहुत बड़ी शक्ति है हम मानते हैं मगर वो शक्ति ही क्या जिसका पतन ना हो,अगर आप मीडिया और राष्ट्र के लिए इसके योगदान को बचाना चाहते हैं और मीडिया के वास्तविक शुभ चिन्तक हैं तो आप मीडिया के अस्तित्व को बचाने के लिए अबिलम्ब प्रयास प्रारम्भ करें,क्योंकि हमें आभास है शायद आपको आभास नहीं है मीडिया अपने चरम पर पहुँच चुका है और इसका वर्तमान स्वरुप अगर इसी प्रकार जारी रहा तो निश्चित ही निकट भविष्य में मीडिया की सभी बतों पर लोग अविश्वास करेंगे और आप लोगों की खिल्ली उड़ायेंगे,जिस प्रकार आज कल राजनितिक दलों और इनके नेताओं के समर्थक उनके गलत कर्मों के कारण सामाजिक मीडिया में आम जनता के प्रतिनिधि उन युवाओं के गुस्से का शिकार हो रहें है जो वास्तव में किसी भी सामाजिक संस्थान या राजनीतिक दल से सम्बंधित नहीं हैं,उसकी प्रकार मीडिया भी इन युवाओं का शिकार हो रही है,देश के किसी भी वेब पोर्टल पर ,सोशल मीडिया के किसी भी पन्ने पर नेताओं और राजनीतिक दलों के पक्ष में लिखने वाला कोई नहीं है उसी प्रकार मीडिया के पक्ष में लिखने वाला कोई नहीं है,आप एक बार यकीन करके देखिये और सधे हुए विचार से सोचिये अगर मीडिया या राजनीतिक दलों के द्वारा कुछ भी अच्छा किया जाता तो 100 में जयादा नहीं तो 33% लोग तो आपके पक्ष में कुछ लिखते मगर यहाँ गणित 100 Vs 0 है.
आपको इसका उत्तर लिखने की आवश्यकता पड़े या ना पड़े इसका कोई अर्थ नहीं मगर आप भारतीय वैदिक ग्रंथों का अध्ययन और आश्रम व्यवस्था पर कुछ आलेख देख लें,साथ ही ऐसा लेख लिखें जो वास्तव में सबके लिए लाभ - दायक हो गाली गलौंच का मै समर्थक नहीं घौर विरोधी हुं और ऐसे मूर्खों की प्रबल निंदा करता हुं ,और मैंने अपने शब्दों में यथा संभव सम्मान देने का भरसक प्रयास किया है,फिर भी महेंद्र श्रीवास्तव जी अगर त्रुटी बश कुछ गलत लिखा गया हो तो क्षमा कीजियेगा. वल्कि हमारे और आपके लिए अपना ज्ञान और बढाकर सब कुछ स्पष्ट करने की आवश्यकता है,अष्टांग योग को बाबा राम देव सहित सभी सन्यासी अच्छी तरह जानते हैं लेकिन ये अष्टांग योग जिसे आपने देखा है वो क्या देश के आम लोगों और गृहस्थ लोगों के लिए संभव है,मै समझता हुं नहीं और उसकी सभी लोगों को आवश्यकता नहीं है क्योंकि उनकी आवश्यकता प्राणायाम और बाबा रामदेव या किसी भी ऐसी संस्था के द्वारा बताये गए सीमित योग से पूरी हो जाती है योग से सारे भारत को सन्यासी नहीं बनाना है वल्कि स्वस्थ बनाना है,और उसके लिए जो भी वर्तमान व्यवस्था दी गयी है वो पूर्ण है,आपको ये बताना मेरा परम कर्तव्य है कि कोई भी किसी विषय पर पूर्ण नहीं होता,ना तो मै ना आप ना बाबा रामदेव जी ना साध्वी चिदर्पिता जी अगर आपको विश्वास ना हो तो मुझे केवल राष्ट्र नमक शब्द या वास्तविक राष्ट्र का अर्थ बता दीजियेगा और आप साध्वी चिदर्पिता जी से भी पूछ लीजियेगा मै आपको विश्वास दिलाता हुं एक बार हो सकता है आप स्वयं उतार दे दें मगर साध्वी जी निश्चित रूपसे इसका उत्तर नहीं दे पाएंगी,...एक महान रहस्य की बात ये है कि योग पर महर्षि पतंजलि ने जो कुछ भी लिखा वो भी पूर्ण नहीं है,इसीलिए उनको भी योग पर एक गुरु का दर्ज़ा नहीं दिया जा सकता योग के वास्तविक दो गुरु हैं एक भगवान् महादेव और दुसरे भगवान् नारायण अथवा श्री कृष्ण,बाबा रामदेव जी तो फिर भी योग के ऐसे शिष्य हैं जो कि जितना सीखते हैं उतना ही लोगों को बता देते हैं,हमारी सभ्यता - और संस्कृति को विदेशी आक्रमण कारियों द्वारा व्यापक हानि पहुंचाई गयी है इसीलिए योग पर उप्लाभ्धा विस्तृत सामग्री में से केवल महर्षि पतंजलि का ही ग्रन्थ किसी तरह बचा रह गया,वरना ईश्वर आराधना से लेकर ,नृत्य,संतान उत्पत्ति( इसका अर्थ बहुत विस्तृत है जो यहाँ बताया नहीं जा सकता),वाणिज्य-व्यवसाय,चलना - फिरना त्याग और संग्रह यहाँ तक कि जो कुछ भी हम जीवन में करते हैं वो सबकुछ केवल योग है कुछ और नहीं,बस अंतर इतना है कि कुछ लोग अच्छी बातों का योग करते है कुछ बुरी बातो का योग करते है. ये आपके ऊपर है आप किस प्रकार का योग करेंगे और उसके किस परिणाम को लेकर ईश्वर के पास जायेंगे.
