शनिवार, 7 जुलाई 2012


श्री महेंद्र श्रीवास्तव जी आपका आलेख हमने पढ़ा, इसमें जवाब देने लायक हालाँकि कुछ नहीं है,लेकिन फिर भी मन में आपकी बातों से पीधन हुई तो कुछ लिखना मेरा परम कर्तव्य है,..जहां तक बात संत की है वो ना तो आर्य समाजी होता है और ना ही सनातनी , संत कवक संत होता है और आर्य समाज का मूल आधार जो की वेद हैं उसमे स्पष्ट लिखा है कि हमारे यहाँ आश्रम व्यवस्था के अंतर्गत संन्यास एक जीवन जीने का मार्ग है और ये व्यवस्था आर्यसमाजिक व्यवस्था से बहुत पहले की वैदिक कालीन व्यवस्था है,आर्य सामाजिक व्यवस्था 200 वर्षों से भी नवीन व्यवस्था है ,क्या आपको लगता है की संन्यास और भारत में साधू - संत के लिए बनाई गयी व्यवस्था केवल 200  वर्ष या उसे कम पुरानी है,ज्यादा लिखने की आवश्यकता है नहीं,वस इतना ही पर्याप्त है की आपको केवल भारत की सभ्यता और संस्कृति को ठीक से अध्ययन करना चाहिए,तथा सबसे आवश्यक सलाह ये है की आज कल भारतीय मीडिया के बारे में लोगों में बहुत गुस्सा है उसे ठीक से देखें और पहचानने का प्रयास करिए, मेरा ये निवेदन सभी मीडिया के भाइयों से है,ना की केवल आपसे ,क्योंकि भारत में विकास,सत्य,और न्याय के लिए लड़ने हेतु मीडिया का कुछ वर्षों पहले तक बहुत महत्वपूर्ण स्थान था जो की आज मीडिया खो चुका है,जिसको आप सार्वजानिक जीवन में भली - भांति जानते हैं,और अगर विश्वास ना हो तो एक राष्ट्र व्यापी सर्वे करवा लीजिये जिसमे आम लोग आपके साथ सर्वे टीम में शामिल हों,आपको जनता के उस गुस्से का अहसास हो जायेगा,जिसका आपको आभास तो है मगर अभी उसके विनाशक परिणामों से आप भली - भांति परिचित नहीं है,जिसका उत्तर आपको केवल काल चक्र ही देगा,क्योंकि समय बहुत मूल्यवान और शक्तिशाली होता है जो बड़ी से बड़ी शक्तियों को समूल नष्ट कर देता है,आज मीडिया एक बहुत बड़ी शक्ति है हम मानते हैं मगर वो शक्ति ही क्या जिसका पतन ना हो,अगर आप मीडिया और राष्ट्र के लिए इसके योगदान को बचाना चाहते हैं और मीडिया के वास्तविक शुभ चिन्तक हैं तो आप मीडिया के अस्तित्व को बचाने के लिए अबिलम्ब प्रयास  प्रारम्भ करें,क्योंकि हमें आभास है शायद आपको आभास नहीं है मीडिया अपने चरम पर पहुँच चुका है और इसका वर्तमान स्वरुप अगर इसी प्रकार जारी रहा तो निश्चित ही निकट भविष्य में मीडिया की सभी बतों पर लोग अविश्वास करेंगे और आप लोगों की खिल्ली उड़ायेंगे,जिस प्रकार आज कल राजनितिक दलों और इनके नेताओं के समर्थक उनके गलत कर्मों के कारण सामाजिक मीडिया में आम जनता के प्रतिनिधि उन युवाओं के गुस्से का शिकार हो रहें है जो वास्तव में किसी भी सामाजिक संस्थान या राजनीतिक दल से सम्बंधित नहीं हैं,उसकी प्रकार मीडिया भी इन युवाओं का शिकार हो रही है,देश के किसी भी वेब पोर्टल पर ,सोशल मीडिया के किसी भी पन्ने पर नेताओं और राजनीतिक दलों के पक्ष में लिखने वाला कोई नहीं है उसी प्रकार मीडिया के पक्ष में लिखने वाला कोई नहीं है,आप एक बार यकीन करके देखिये और सधे हुए विचार से सोचिये अगर मीडिया या राजनीतिक दलों के द्वारा कुछ भी अच्छा किया  जाता  तो 100 में जयादा  नहीं तो 33% लोग तो आपके पक्ष में कुछ लिखते  मगर यहाँ गणित  100 Vs 0 है.

आपको इसका  उत्तर लिखने की आवश्यकता  पड़े या ना पड़े इसका कोई अर्थ नहीं मगर आप भारतीय वैदिक ग्रंथों का अध्ययन और आश्रम व्यवस्था पर कुछ आलेख देख लें,साथ ही ऐसा लेख लिखें जो वास्तव में सबके लिए लाभ - दायक हो गाली  गलौंच  का मै समर्थक नहीं घौर विरोधी हुं और ऐसे मूर्खों की प्रबल निंदा करता हुं ,और मैंने  अपने शब्दों  में यथा  संभव  सम्मान  देने का भरसक  प्रयास किया  है,फिर  भी महेंद्र श्रीवास्तव जी अगर त्रुटी  बश  कुछ गलत लिखा गया  हो तो क्षमा  कीजियेगा. वल्कि हमारे और आपके लिए अपना ज्ञान और बढाकर सब कुछ स्पष्ट करने की आवश्यकता है,अष्टांग योग को बाबा राम देव सहित सभी सन्यासी अच्छी तरह जानते हैं लेकिन ये अष्टांग योग जिसे आपने देखा है वो क्या देश के आम लोगों और गृहस्थ लोगों के लिए संभव है,मै समझता हुं नहीं और उसकी सभी लोगों को आवश्यकता नहीं है क्योंकि उनकी आवश्यकता प्राणायाम और बाबा रामदेव या किसी भी ऐसी संस्था के द्वारा बताये गए सीमित योग से पूरी हो जाती है योग से सारे भारत को सन्यासी नहीं बनाना है वल्कि स्वस्थ बनाना है,और उसके लिए जो भी वर्तमान व्यवस्था दी गयी है वो पूर्ण है,आपको ये बताना मेरा परम कर्तव्य है कि कोई भी किसी विषय पर पूर्ण नहीं होता,ना तो मै ना आप ना बाबा रामदेव जी ना साध्वी चिदर्पिता जी अगर आपको विश्वास ना हो तो मुझे केवल राष्ट्र नमक शब्द या वास्तविक राष्ट्र का अर्थ बता दीजियेगा और आप साध्वी चिदर्पिता जी से भी पूछ लीजियेगा मै आपको विश्वास दिलाता हुं एक बार हो सकता है आप स्वयं उतार दे दें मगर साध्वी जी निश्चित रूपसे इसका उत्तर नहीं दे पाएंगी,...एक महान रहस्य की बात ये है कि योग पर महर्षि पतंजलि ने जो कुछ भी लिखा वो भी पूर्ण नहीं है,इसीलिए उनको भी योग पर एक गुरु का दर्ज़ा नहीं दिया जा सकता योग के वास्तविक दो गुरु हैं एक भगवान् महादेव और दुसरे भगवान् नारायण अथवा श्री कृष्ण,बाबा रामदेव जी तो फिर भी योग के ऐसे शिष्य हैं जो कि जितना सीखते हैं उतना ही लोगों को बता देते हैं,हमारी सभ्यता - और संस्कृति को विदेशी आक्रमण कारियों द्वारा व्यापक हानि पहुंचाई गयी है इसीलिए योग पर उप्लाभ्धा विस्तृत सामग्री में से केवल महर्षि पतंजलि का ही ग्रन्थ किसी तरह बचा रह गया,वरना ईश्वर आराधना से लेकर ,नृत्य,संतान उत्पत्ति( इसका अर्थ बहुत विस्तृत है जो यहाँ बताया नहीं जा सकता),वाणिज्य-व्यवसाय,चलना - फिरना त्याग और संग्रह  यहाँ तक कि जो कुछ भी हम जीवन में करते हैं वो सबकुछ केवल योग है कुछ और नहीं,बस अंतर इतना है कि कुछ लोग अच्छी बातों का योग करते है कुछ बुरी बातो का योग करते है. ये आपके ऊपर है आप किस प्रकार का योग करेंगे और उसके किस परिणाम को लेकर  ईश्वर के पास जायेंगे.

गुरुवार, 21 जून 2012

About religion and politics .

  We should see that how the nation and the world should be developed , and we should forget about to break down each other's religions,for this, we must rouse the spirit of your heart with cosmopolitanism , and we've to learn to live like a joint family of the world.

मंगलवार, 19 जून 2012

श्री मान जी क्या आप सहमत हैं ?

श्री मान जी क्या आप सहमत हैं ?

1:-देश कि जनता अगर संविधान के अनुरूप कोई मांग रखती है तो आपको क्यों लगता है कि हम लोग संसदीय व्यवस्था को समाप्त करना चाहते हैं ?
2:-क्या आप सहमत हैं कि राष्ट्रीय स्तर पर जनहित का कोई नियम-कानून बनाते समय सभी जातीय और धार्मिक वर्गों से (जिनकी जनसँख्या 50 लाख से कम न हो) सहमती ली जाये ?
3:-क्या आप सहमत हैं कि जो प्रतियाशी चुनाव में खड़ा किया जाता है,उस पर भ्रष्टाचार के आरोप हों तो उसकी राजनितिक दल से सदस्यता समाप्त कर,चुनाव लड़ने पर रोक लगे ?
4:-क्या आप सहमत हैं कि किसी जनप्रतिनिधि के विधानसभा/लोकसभा क्षेत्र में निर्माण और विकास कार्यों में दोष हो/ क्षेत्र में विकास कार्य ठीक से न हो और जन धन का गबन करे तो उसके,चुनाव लड़ने पर रोक लगा दी जाये ?
5:-सरकारी सर्वेक्षणों के अनुसार विकास या जन सहायता को दिए धन में से 30% प्रयोग में लाया जाता है,70% भ्रष्टाचारी खा जाते हैं,क्या आप सहमत हैं कि इसके विरुद्ध सख्त जनलोकपाल बनाकर कठोर कार्यवाही की जाये ?
6:-क्लर्क स्तर के कर्मचारियों के पास छापों में पचासों करोड़ से अधिक की संपत्ति मिली है,ऐसे भ्रष्टाचार की निगरानी हेतु निगरानी तंत्र नहीं है,क्या आप सहमत हैं,ऐसे लोगों की निगरानी हेतु जनलोकपाल कानून बनाकर कठोर कार्यवाही हो ?
7:- कर व्यवस्था बहुत भयावह है,जो 20% आय+10%सेवा+10%सीमा शुल्क+12.5%मूल्य वर्धित+10% अन्य कर(परिवहन+जल+गृह+बिक्रीकर) सहित लगभग 62.5%बैठता है जिससे जनता दिनो-दिन गरीब होती जा रही है क्योंकि 20%आयकर के अतिरिक्त शेष 42.5% कर किसी न किसी रूप में मजदूर,किसान,रिक्शा-ट्राली चालक आदि से बसूला जाता हैं,धन की अत्यधिक उपलब्धता के कारण भ्रष्टाचारियों को भ्रष्ठाचार करने का अवसर प्राप्त होता है,क्या आप सहमत है कि कर व्यवस्था को पुनः संशोधित किया जाये और कर 62.5% से घटाकर 35% किया जाये ?
8:- राशनकार्ड,गैस कनेक्शन,विद्युत् कनेक्शन,निवास प्रमाण-पत्र,आदि को बनाने में बहुत रिश्वतखोरी है,क्या आप सहमत है कि मतदाता पहचान-पत्र की तरह इन दस्तावेजों को भी घरों तक पहुँचाना आवश्यक है ?
9:- क्या आप सहमत हैं कि राजनितिक दलों को झूठे वादों से बचानें हेतु यह आवश्यक है कि चुनावी घोषणा-पत्रों को अभिलेखीय रूप में रखा जाये,जिससे समय आने पर उनका उत्तर दायित्व तय कर उनसे जवाब मांगा जाये ?
जनता करे सवाल ? 

राष्ट्र अद्धयायी !

राष्ट्र का अर्थ होता है ......................................................... धर्म के दो प्रकार होते हैं एक वो "जो हमारा सास्वत धर्म है" और एक है "आध्यात्म " एक का सम्बन्ध लौकिक घटाओं या तत्वों से होता है, और दुसरे का सम्बन्ध आलौकिक शक्तियों से होता है,
निश्चित रूप से हमें यहाँ केवल लौकिक या केवल आलौकिक धर्म में से किसी एक पर विचार नहीं करना चाहिए, वल्कि दोनों पर विचार करना चाहिए क्योंकि दोनों ही मानव जीवन की रीढ़ हैं,एक के बिना जीवित नहीं रह सकते और दुसरे के बिना मरना संभव नहीं है.
हमें पक्ष या विपक्ष की बाते न सोचते हुए केवल धर्म के दोनों स्वरूपों की बात करनी चाहिए,और इसमें भी हमें सर्व प्रथम धर्म के लौकिक पक्ष की ही बात करनी चाहिए:---
तो धरम का लौकिक पक्ष है "अर्थशाश्त्र " अर्थात "राजनीति" भारत वर्ष के किसी भी ग्रन्थ में जो वास्तव में राजनीति से सम्बंधित रहा है,उसमे कभी सत्ता या शासन को राजनीति से नहीं जोड़ा गया है,क्योंकि यहाँ राज्य या राजा की नीति को कभी प्रमुखता नहीं दी गयी वल्कि राजतन्त्र में भी जनता के सुख एवं सुविधा के लिए ही सदैव व्यवस्था बनाने का प्रयास किया गया,इसीलिए भारत में "राजनीति" को "अर्थशाश्त्र" ही कहा गया अर्थात ऐसा शाश्त्र जो जीवन की प्रतियेक
आवश्यकता,समस्या,जटिलता,सुख-सुविधा,और संकट के हल के लिए एक "अर्थ या उत्तर" प्रदान करता हो.
राजनीति को सत्ता अर्थात रजा या राज्य की नीति कह सकते हैं,इसको जनता की नीति नहीं कह सकते,अगर ऐसा होता तो इसको जन-नीति कहा जाता और सत्ता के साथ राजनीति नामक ये शब्द कभी प्रादुर्भाव में नहीं आता,ये राजिनी नामक शब्द पश्चिमी देशों से भारत या अन्य और देशों में आया है,और इसी ने भारत सहित अन्य कई देशों की सत्ता एवं शासन पद्धति को विकृत करके उसे जन-नीति के स्थान पर नेता नीति या राजनीति बना दिया,जिसमे जनता को इसके सड़ने का अहसास हो रहा है,फलस्वरूप जनता संसार के कई हिस्सों में सत्ता एवं शासन में जन-नीति की स्थापना के लिए लगातार छटपटा रही है,और अनेक देशों में आन्दोलन हो रहें है.
तो मानव के धर्म की बात की जाये तो मानव धर्म पूरी तरह से लौकिक होता है और उसका ईश्वर की आराधना या आध्यात्म से दूर दूर तक कोई सम्बन्ध नहीं होता है ! मानव-मानव के काम आये,उसके सुख-दुःख का ध्यान रखे,"वसुधैव कुटुम्बकम" की मूल भारतीय और मानवीय भावना के साथ सभी के विकास और उन्नति के लिए प्रयास करता रहे. यही मानव का मूल धर्म है जो धर्म के आध्यात्मिक पक्ष से बिलकुल अलग है.
लेकिन इस मानवीय धर्म की जगह केवल सत्ता और शासन को राज्य या शासक की नीति के रूप में "जिसको आज-कल राजनीति" भी कहा जाता है जनता के सामने रख दिया गया है,और हमको बिकल्प हीनता और शुन्य नेतृत्व वाले कमजोर शासन और सत्ता को अपने ऊपर शासन करते देखना पड़ रहा है.
सत्ता केवल एक बात पर विशेष ध्यान दे रही है कि किस प्रकार धर्म के मानवीय पक्ष को कुचल दिया जाये,और अपनी पूरी उर्जा केवल धर्म के सभी स्वरूपों को समाप्त करने में लगा रही है,न कि मानव के,राष्ट्र के या जनता के विकास,उन्नति,या उसके कल्याण के लिए.
हमें अगर व्यवस्था परिवर्तन करना है तो सबसे पहले यह समझाना होगा कि धर्म और सत्ता,दोनों ही एक मानव मस्तिष्क की विचार रुपी माता के गर्भ से उत्पन्न हैं,और दोनों में से किसी को भी समाप्त नहीं किया जा सकता हा,अगर कोई ऐसा प्रयास कर रहा है तो ऐसे व्यक्ति,संस्था या सत्ता का विनाश निश्चित संभव है....
"राष्ट्र-अद्धयायी"

इसी को कहते हैं जलवे में जल जाना

इसी को कहते हैं जलवे में जल जाना 
बात बहुत मजेदार है , सबके लिए नहीं , लेकिन बहुतों के लिए , हाँ ये अलग बात है कि है सबके के काम की , विशेष रूपसे उनके लिए जो बहुत जलवा फरोश हैं या बहुत जलवा खोर हैं , ऐसे लोगों के लिए ये एक शिक्षा है कि वो भले ही अपने जलवे बिखेरते रहें लेकिन अपने जलवों से दूसरों को जलाने की कोशिश किसी भी जलवा फरोश को बहुत महंगी पड़ सकती है और तब और भी महंगी पड़ सकती है जब वो किसी और के दम पर पर अपने जलवे बिखेर रहा हो . जैसे कि कांग्रेस राष्ट्रीय महासचिव दिग्विजय सिंह और सलमान खुर्शीद , बेनी प्रसाद वर्मा , पी ० एल ० पुनिया और साथ - साथ राहुल गाँधी के साथ हुआ है , चलो खैर राहुल को तो छोडो वो तो फिर भी दूसरों कि बुद्धि से प्राप्त अपने बोल बोलता है मगर दिग्विजय सिंह जी का क्या जो बेचारे न तो अपनी जवान बोलते थे न अपनी बुद्धि का प्रयोग करते थे , पता नहीं किन किन लोगों के बारे में कहाँ - कहाँ से झूठी सच्ची ख़बरें मिलती रहती थी या हो सकता है कि उनसे केवल बोलने के लिए ही उनको गलत फीडिंग दी गयी हो ये तो भगवान् जाने , लेकिन इसके बदले उनको रेगिस्तान में मृग मरीचिका कि भाँति बस यह एहसास कराते रहा गया कि वाह भाई क्या जलवे हैं जनाब के , बेचारे को जलवे के अलावा कुछ और दिखाई और सुझाई नहीं पड़ा , कि आखिर क्या बोल रहें है किस्से किसके बारे में बोल रहें हैं , बस बोलते गए , बोलते गए , कुछ भी अंट - शंट बोलते समय बस उनको अपने दिखावटी जलवे का ही ख्याल रहा ये ख्याल नहीं रहा कि आखिर ये रास्ता कंही बंद भी हो सकता है , ये तो पता नहीं कि कांग्रेस पार्टी को उनके बयानों का कोई लाभ मिला या नहीं मगर इसके बदले में कांग्रेस पार्टी ने अल्पसंख्यकों को जो भी लाभ दिए जाने थे उनकी श्रेणी में मुस्लिमों के साथ साथ बौद्ध , शिख , जैन , को पीछे धकेल कर केवल इसाईयों को वास्तविक अल्पसंखयकों के सारे लाभ दिलवा दिए हैं , इससे पता चलता है कि कोंग्रेस कि मनसा हिन्दू और मुस्लिमों के बारे में वही है जो अन्रेजों कि थी यानि बाटों और राज करों , मै यंहां ये बता देना अपना कर्त्तव्य समझता हूँ कि कई सरकारी नौकरियों के अतिरिक्त उच्च शिक्षा एवं विश्वविद्यालयी स्तर की शिक्षा में फॉर्म भरने के लिए यह कॉलम भरवाया जा रहा है कि क्या आप ईसाई समुदाय से हैं या नहीं , मैंने कल ही ये संघ लोक सेवा आयोग कि वेबसाईट पर असिस्टेंट प्रोविडेंट फंड कमिश्नर के लिए होने वाले आवेदन तथा कानपूर विश्वविद्यालय के एम् . एड . के फार्म में और यु ० जी ० सी ० के फार्म में ऐसा देख है , और आप भी देख सकते हैं !
तो वापिस दिग्विजय जी के पास चलते हैं , तो चुनाव से पहले बन्दे कि क्या हैसियत थी हर झूठी सच्ची खबर पर मीडिया दौड़ पड़ता था , रोज नया बखेड़ा , रोज नया विवादित बयान इससे देश के बहुसंख्यक समुदाय को तो लगा कि जैसे वो किसी दुसरे गृह के प्राणी हैं जिनको कभी भी देश से बहार जाने का फरमान भी दिग्विजय सिंह जी सुना सकते थे , क्या जलवे थे जनाब के , मगर आखिर इन्सान तो इन्सान है , ज्यादा आग से खेलने पर जल ही जाता है , फिर दिग्विजय सिंह जी तो मुह में रोज आग के गोले लेकर चलते थे , और अपनी जलवा फरोशी करते रहते थे , मगर आसमान में आग के गोले दागते दागते कुछ उनके ऊपर ही गिर गए या पता नहीं किसी ने गिरा दिए हुआ ये कि बेचारे खुद ही अपने जलवों कि आग में जल गए , और " इसी को कहते हैं जलवे में जल जाना " .
आज कल शायद गम में होंगे और इसीलिए कम दीख रहें हैं, कुछ लोग कह सकते हैं कि उनका केवल प्रयोग किया गया है,अब पता नहीं ये सच है या झूठ मगर एक बात जरुर है कि कुछ लोगों के लिए उनका सदुपयोग किया गया है मगर बहुत ज्यादा के लिए कष्टकारी दुरूपयोग किया गया है ! तो इसको सभी एक शिक्षा की तरह समझें कि जलवे में जलने से भला है जलवों से परहेज करना ! खैर हम कौन हैं कहने वाले न पिद्दी न पिद्दी के शोरबे , मानों या न मानों आगे आपकी मर्जी !

कांग्रेस के आत्म विश्वास की वजह क्या है ?

कांग्रेस के आत्म विश्वास की वजह क्या है ?

केंद्र में कांग्रेस सरकार के आठ वर्ष पूरे हो चुके हैं , वर्तमान तीन वर्ष और पूर्व के पांच वर्ष के कार्य काल में जो कुछ भी हुआ वो देश और देश वासियों के लिए अत्यंत घातक है , सारी दुनिया में भारत की छवि रसातल में पहुँच गयी है , इस सरकार के कार्य काल से पूर्व कुछ गैर कांग्रेसी सरकारों ने जो भी अच्छी नीतियाँ बनाकर देश को प्रगति के पथ पर आगे बढाया था उसको वर्त्तमान सरकार के चुनिंदा मंत्री और लोक सभा व राज्य सभा सदस्य मिलकर बर्बाद कर चुके हैं , देश पुनः उसी स्थिति में जा चुका है जहाँ कांग्रेस के 25 वर्ष पहले के कार्य काल में था , कई मोर्चों पर सरकार की विफलता देखकर यही लगता है कि जैसे वर्तमान सरकार देश के साथ कोई षड़यंत्र कर रही हो .
इस तीन वर्ष के कार्य काल के पूर्व भी पांच वर्ष कांग्रेस सरकार ने केंद्र में शासन किया है , और हमें ठीक से याद है और अगर हम भूल गए हों तो ठीक से याद करने की आवश्यकता है की पिछले पांच वर्षों के कार्यकाल में भी कांग्रेस नीत सरकार ने ऐसा कोई कार्य नहीं किया था जिसके लिए उसको पुनः सत्ता में आना चाहिए था .
और जिस प्रकार कांग्रेस सत्ता में आ गयी अगर फिर से उसी प्रकार चुनाव प्रक्रिया का दुरूपयोग हुआ तो इसमें कोई आश्चर्य नहीं कि इस बार पुनः सत्ता में आ जाए .
सभी को याद होगा कि 2009 का आम चुनाव संपन्न होने पर चरों और से चुनाव प्रक्रिया में गड़बड़ी और इलेक्ट्रोनिक वोटिंग मशीन में हेर-फेर के आरोप कांग्रेस पर लगे थे , लेकिन कानूनी रूपसे इसको किसी भी प्रकार चुनौती देने के सीमित प्रावधानों के कारन जयादा कुछ किया नही जा सका .
मै स्वयं मुरादाबाद लोकसभा क्षेत्र में चुनाव प्रक्रिया से जुड़ा था जहाँ कांग्रेस ने मोहम्मद अज़हरुद्दीन को हैदराबाद से आयात करके भारतीय जनता पार्टी के सर्वेश सिंह के विरुद्ध चुनाव में उतारा था .
मै आपको बताना चाहता हूँ कि चुनाव प्रक्रिया समाप्त होने के बाद जिला निर्वाचन अधिकारी -*ने उपरोक्त लोक सभा क्षेत्र में 50.50% वोटिंग होने की अधिकारिक घोषणा की थी , लेकिन जिस दिन काउंटिंग हुयी तो इलेक्ट्रोनिक वोटिंग मशीनों में 57.50% वोट निकले हम यह नहीं जान पाए कि आखिर गड़बड़ी कंहाँ हुयी मगर हमको ये मालूम था कि मुरादाबाद विकास प्राधिकरण कालोनी में बी.जे.पी. उम्मीदवार सर्वेश सिंह जी की बहिन और उनके परिवार के अन्य लोग रहते थे , और इन लोगों ने एफिडेविट पर सशपथ बताया था की सम्बंधित बूथ से 90 लोगों ने सर्वेश सिंह जी के पक्ष में मतदान किया था , जबकि परिणाम आने पर वोटों की गिनती के बाद उस बोथ पर केवल तीन ( 03 ) हो वोट उनके पक्ष में निकले थे , यह केवल एक बूथ की बात है जो मै आपको बता रहा हूँ लेकिन इसके अतिरिक्त भी अन्य बूथों पर कमोबेश यही स्थिति थी , अर्थात जहाँ उनके सर्वेश सिंह जी के पक्ष में 50 वोट पड़े थे वहां केवल पांच या छः वोट ही गिनती के समय मिले थे.
कुछ सूचनाएं जन-सुचना अधिकार अधिनियम के अंतर्गत मांगी गयी जो जान-बूझकर तीन माह बाद दी गयी और चुनाव सम्बंधित किसी भी गड़बड़ी को नयायालय में केवल 60 दिन के ही अन्दर चुनौती दी जा सकती है.

अतः इस सम्बन्ध में चाहकर भी कुछ नहीं किया जा सका था, आपको बताना आवश्यक है की उत्तर प्रदेश से जितने भी लोक सभा सदस्य जीते हैं उनमे से वास्तव में एक भी ऐसा नही है जो निष्पक्ष रूपसे चुनाव लड़ने पर विधायक या एम०पी० तो क्या पार्षद का भी चुनाव जीत सके , यही स्थिति सारे देश में थी जिसके दम पर कांग्रेस ने निवर्तमान चुनाव जीता था.
वर्तमान सरकार भी इसी दंभ के बशीभूत होकर एक से बढ़कर अनाप-शनाप जन विरोधी निर्णय ले रही है क्योंकि शायद उसे लगता है कि वो पिछली बार की तरह ही इस बार भी चुनाव में इलेक्ट्रोनिक वोटिंग मशीनों में गड़बड़ी करके चुनाव जीत सकती है.
अतः इस सम्बन्ध में अब यह ध्यान देने वाली बात है की हम लोग ऐसी संभावित स्थिति से देश को बचाने के लिए क्या कुछ करें ?
और उत्तर है कि हमको इलेक्ट्रोनिक वोटिंग मशीनों की जगह केवल बैलेट पेपर द्वारा वोट डालने के लिए आन्दोलन चलाना चाहिए.