मंगलवार, 19 जून 2012

इसी को कहते हैं जलवे में जल जाना

इसी को कहते हैं जलवे में जल जाना 
बात बहुत मजेदार है , सबके लिए नहीं , लेकिन बहुतों के लिए , हाँ ये अलग बात है कि है सबके के काम की , विशेष रूपसे उनके लिए जो बहुत जलवा फरोश हैं या बहुत जलवा खोर हैं , ऐसे लोगों के लिए ये एक शिक्षा है कि वो भले ही अपने जलवे बिखेरते रहें लेकिन अपने जलवों से दूसरों को जलाने की कोशिश किसी भी जलवा फरोश को बहुत महंगी पड़ सकती है और तब और भी महंगी पड़ सकती है जब वो किसी और के दम पर पर अपने जलवे बिखेर रहा हो . जैसे कि कांग्रेस राष्ट्रीय महासचिव दिग्विजय सिंह और सलमान खुर्शीद , बेनी प्रसाद वर्मा , पी ० एल ० पुनिया और साथ - साथ राहुल गाँधी के साथ हुआ है , चलो खैर राहुल को तो छोडो वो तो फिर भी दूसरों कि बुद्धि से प्राप्त अपने बोल बोलता है मगर दिग्विजय सिंह जी का क्या जो बेचारे न तो अपनी जवान बोलते थे न अपनी बुद्धि का प्रयोग करते थे , पता नहीं किन किन लोगों के बारे में कहाँ - कहाँ से झूठी सच्ची ख़बरें मिलती रहती थी या हो सकता है कि उनसे केवल बोलने के लिए ही उनको गलत फीडिंग दी गयी हो ये तो भगवान् जाने , लेकिन इसके बदले उनको रेगिस्तान में मृग मरीचिका कि भाँति बस यह एहसास कराते रहा गया कि वाह भाई क्या जलवे हैं जनाब के , बेचारे को जलवे के अलावा कुछ और दिखाई और सुझाई नहीं पड़ा , कि आखिर क्या बोल रहें है किस्से किसके बारे में बोल रहें हैं , बस बोलते गए , बोलते गए , कुछ भी अंट - शंट बोलते समय बस उनको अपने दिखावटी जलवे का ही ख्याल रहा ये ख्याल नहीं रहा कि आखिर ये रास्ता कंही बंद भी हो सकता है , ये तो पता नहीं कि कांग्रेस पार्टी को उनके बयानों का कोई लाभ मिला या नहीं मगर इसके बदले में कांग्रेस पार्टी ने अल्पसंख्यकों को जो भी लाभ दिए जाने थे उनकी श्रेणी में मुस्लिमों के साथ साथ बौद्ध , शिख , जैन , को पीछे धकेल कर केवल इसाईयों को वास्तविक अल्पसंखयकों के सारे लाभ दिलवा दिए हैं , इससे पता चलता है कि कोंग्रेस कि मनसा हिन्दू और मुस्लिमों के बारे में वही है जो अन्रेजों कि थी यानि बाटों और राज करों , मै यंहां ये बता देना अपना कर्त्तव्य समझता हूँ कि कई सरकारी नौकरियों के अतिरिक्त उच्च शिक्षा एवं विश्वविद्यालयी स्तर की शिक्षा में फॉर्म भरने के लिए यह कॉलम भरवाया जा रहा है कि क्या आप ईसाई समुदाय से हैं या नहीं , मैंने कल ही ये संघ लोक सेवा आयोग कि वेबसाईट पर असिस्टेंट प्रोविडेंट फंड कमिश्नर के लिए होने वाले आवेदन तथा कानपूर विश्वविद्यालय के एम् . एड . के फार्म में और यु ० जी ० सी ० के फार्म में ऐसा देख है , और आप भी देख सकते हैं !
तो वापिस दिग्विजय जी के पास चलते हैं , तो चुनाव से पहले बन्दे कि क्या हैसियत थी हर झूठी सच्ची खबर पर मीडिया दौड़ पड़ता था , रोज नया बखेड़ा , रोज नया विवादित बयान इससे देश के बहुसंख्यक समुदाय को तो लगा कि जैसे वो किसी दुसरे गृह के प्राणी हैं जिनको कभी भी देश से बहार जाने का फरमान भी दिग्विजय सिंह जी सुना सकते थे , क्या जलवे थे जनाब के , मगर आखिर इन्सान तो इन्सान है , ज्यादा आग से खेलने पर जल ही जाता है , फिर दिग्विजय सिंह जी तो मुह में रोज आग के गोले लेकर चलते थे , और अपनी जलवा फरोशी करते रहते थे , मगर आसमान में आग के गोले दागते दागते कुछ उनके ऊपर ही गिर गए या पता नहीं किसी ने गिरा दिए हुआ ये कि बेचारे खुद ही अपने जलवों कि आग में जल गए , और " इसी को कहते हैं जलवे में जल जाना " .
आज कल शायद गम में होंगे और इसीलिए कम दीख रहें हैं, कुछ लोग कह सकते हैं कि उनका केवल प्रयोग किया गया है,अब पता नहीं ये सच है या झूठ मगर एक बात जरुर है कि कुछ लोगों के लिए उनका सदुपयोग किया गया है मगर बहुत ज्यादा के लिए कष्टकारी दुरूपयोग किया गया है ! तो इसको सभी एक शिक्षा की तरह समझें कि जलवे में जलने से भला है जलवों से परहेज करना ! खैर हम कौन हैं कहने वाले न पिद्दी न पिद्दी के शोरबे , मानों या न मानों आगे आपकी मर्जी !

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