"लोकसभा राष्ट्रवादियों ने लड़ी थी, बिहार मोदी सेना ने लड़ा, हारना तो था ही"
कुछ भी लिखने से पहले ये स्पष्ट करना आवश्यक है कि मै भाजपा या किसी अन्य राजनीतिक दल सदस्य नही हूँ, न प्राथमिक न पूर्ण कालिक, ये दिसंबर 2013 की बात है जब मेरे अनुभव के अनुसार उन लोगों ने देश में हाहाकार मचा रखा था जो आज असहिष्णुता और कट्टरपंथ के सबसे बड़े शिकार हैं, 2013 के कुछ ही समय पूर्व " लक्षित हिंसा विरोधी अधिनियम" की रूप रेखा संसद के बाहर के इन्ही लोगों ने तैयार करके सरकार के पास भेजा था जो आज पुरूस्कार लोटा रहें हैं । उस अधिनियम की पूरी रूप रेखा मैंने स्वयं पढ़ी थी ।
वास्तव में उस "लक्षित हिंसा विरोधी अधिनियम" को पढ़ने के बाद मैंने एक संकल्प लिया, कांग्रेस को नही रहना है, हम ये भी कह सकते हैं कि ऐसे ही संकल्प करोड़ों राष्ट्रवादियों ने लिए थे जिनकी परिणति कांग्रेस के न रहने के रूप में सिद्ध हुई । इसके बाद एक जानी मानी स्वयं सेवी संस्था के अपने कुछ मित्रों के सामने अपनी बात रखी और कहा कि "कांग्रेस को रहना चाहिए या नही" सभी ने मेरे ही संकल्प को दोहराया अर्थात "कांग्रेस को नही रहना है" और हमने अपनी रणनीति तैयार की, बस 3 दिन और लोकसभा चुनाव का ताना बाना तैयार ।
सबसे पहले हमने पुराने मतदाताओं के नामों में सुधार और नए नामों को जोड़ने के लिए कार्य प्रारम्भ किया, हमने इसको नाम दिया मतदाता अभियान, इसमें हम घर -घर मतदाता बनाने वाले फॉर्म पहुंचाने गए, और सभी नागरिकों से आग्रह किया कि ये फॉर्म भरकर अपने अपने बूथ स्तरीय अधिकारी को दे दें जिससे मतदाता पहचान पत्र बन सके । इस अभियान में सबसे बड़ी समस्या ये आई कि प्रदेश और देश में राज कर रही राजनीतिक पार्टियों को वैचारिक और बौद्धिक रूप से समर्थन करने वाले सरकारी कर्मचारियों ने जातिगत भेद के रंग दिखाते हुए अपनी जाति से बहार के लोगों के फॉर्म तो लेकर रख लेते थे लेकिन उनको जमा नही करते थे । इसका हमने विरोध और शिकायत भी की लेकिन लाभ नही हुआ ।
अब हमने अपनी रणनीति बदल दी, हमने लोगों के घर घर फिर से फॉर्म पहुंचाए और लोगों से प्रार्थना की कि ये फॉर्म मेरे कार्यालय में जमा करें । दूसरा काम हमने ये किया कि अपने व्यक्तिगत धन से एक नया प्रिंटर खरीदा, एक स्कैनर और लैपटॉप, और अतिरिक्त इंटरनेट कनेक्शन भी लिया और अपने कार्यालय में एक डाटा एंट्री ओपरेटर रखकर ओइनलाइन फॉर्म भरने की व्यवस्था करवाई । दिन में अपने कार्य समाप्त करने के बाद मै स्वयं भी रात में 10 से सुबह 4 बजे तक ओनलाइन फॉर्म भरता था ।
इस मतदाता अभियान में मेरे साथ मेरे 200 से अधिक सहयोगी मेरे नियंत्रण के 11 मतदान स्थलों पर स्वच्छिक सेवा दे रहे थे जिनमे मतदाताओं की अनुमानित संख्या लगभग 2.5 लाख है । जीवन में इस अभियान मेरे अध्ययन काल के बाद पहली बार मेरी इतनी व्यस्तता रही की लगभग 8 माह तक 20 - 20 घंटे लगातार कार्य किया फिर भी लोकसभा 2014 तक हमारा कार्य पूर्ण नही हुआ क्योंकि स्थानीय प्रशासन चुनाव आयोग के निर्देशों का खुला उल्लंघन कर रहा था और जो ओनलाइन फॉर्म भरे गए थे उनके मतदाता पहचान पत्र चुनाव तक 40 प्रतिशत ही बनाये गए, और ये जानबूझकर किया गया ये हम अच्छी तरह से जानते हैं ।
फिर भी हमारे निशुल्क अभियान का जनता पर बहुत प्यारा प्रभाव पड़ा और मेरे घर और कार्यालय पर भीड़ लगने लगी थी, लोगों में परिवर्तन की इतनी प्रबल इच्छा थी कि लोग पैसे देकर भी मतदाता पहचान पत्र बनवाने का दबाव डालते थे । मेरा चुनाव में लगभग 70,000 रुपया जेब से खर्च हुआ फिर भी हमने लोगों से उनके आग्रह के बाद भी एक रुपया तक नही लिया । जब मोदी जी चुनाव प्रचार में अपना "चाय पे चर्चा" कार्यक्रम लेकर आये तो इलाहाबाद शहर के आबकारी चौराहे पर एक कार्यक्रम मेरे द्वारा किये जाने के लिए मोदी जी के प्रचार का कार्य देख रही एक अन्य गैर सरकारी संस्था "सिटीजन फॉर एकाउंटेबल गवर्नेस" द्वारा प्रस्ताव दिया गया जिसे मैंने सहर्ष स्वीकार कर लिया । इस कार्यक्रम के लिए मुझे व्यय होने वाले धन की व्यवस्था उपरोक्त संस्था द्वारा किये जाने की बात हुई और कहा गया कि कार्यक्रम के 3 दिन बाद मुझे खर्च हुआ पैसा मिलेगा । लेकिन कहते हुए ग्लानि होती है कि कार्यक्रम समाप्त होने के बाद उपरोक्त संस्था ने बैंक एकाउंट माँगा और खर्च का ब्यौरा उनकी वेबसाइट पर मंगवाया जो मैंने भेज दिया । लेकिन अंत में हुआ ये कि पैसे तो मिले नही जिसका मुझे कोई दुःख नही है, मगर वो संस्था चुनाव होते ही मैदान छोड़कर भाग गई जिसके किसी कर्मचारी - अधिकारी ने उसके बाद आज तक मुझसे संपर्क नही किया, बस इसी बात का ज्यादा दुःख है की उस संस्था को भागने की आवश्यकता नही थी क्योंकि हमने धन के लिए ये कार्य नही किया था और आज भी ऐसे कार्य हम अपने ही धन से करते हैं आगे भी करते रहेंगें ।
इसके बाद चुनाव हुआ, वोट पड़े, ठीक चुनाव वाले दिन मेरे 200 से अधिक सहयोगी मित्र लगभग 160 बूथों पर बूथ प्रभारी के रूप में नियुक्त किये गए । कई मतदान स्थलों पर जहां भाजपा के कार्यकर्ता पोलिंग एजेंट(अभिकर्ता) के रूप में नियुक्त थे वो चाय - नाश्ता करके भाग गए तो मेरे ही सहमित्रों ने उनके स्थान पर कार्य किया । इस चुनाव में हमने आनंद भवन के अंदर रहने वाले कांग्रेस के कट्टर समर्थक तथा जवाहरलाल नेहरू के ड्राईवर की वर्तमान पीढ़ी तक के वोट भाजपा के पक्ष में डलवा दिए । इलाहाबाद में जहाँ 41 प्रतिशत वोटिंग हुई थी वहीँ मेरे बूथ संख्या 119 पर ये प्रतिशत 53 का रहा जो इलाहाबाद में सर्वोच्च था ।
अंत में लोकसभा के चुनाव का परिणाम आया, वो मोदी या भाजपा के कारण नही था अपितु हम जैसे करोड़ों निस्वार्थ राष्ट्रप्रेमियों के कारण था जिसके बारे में मोदी जी, अमित शाह या भाजपा को गलत फहमी है । चुनाव परिणाम के बाद आज तक भाजपा का कोई कार्यकर्ता, पदाधिकारी या समर्थक मेरा या मेरे सहमित्रों अथवा हम जैसे करोड़ों लोगों का हाल - चाल लेने नही आया, ये रहा भाजपा की दिल्ली और बिहार में हार का सबसे बड़ा कारण, और ऐसा ही उत्तर प्रदेश और अन्य राज्यों में भी होगा अगर इन्होंने अपने सहायकों की खोज खबर जल्दी नही ली तो ।
चुनाव के बाद भाजपा के स्थानीय सांसद ने जो व्यवहार किया उस पर भी एक नजर डाल लेते हैं, मेरे एक सहयोगी हैं श्री राकेश वर्मा, जो इलाहाबाद के कटरा मोहल्ले रहते हैं, उनके घर के सामने एक श्रीजगन्नाथ जी का मंदिर है जिसके एक हिस्से के निर्माण के लिए इलाहाबाद के बहार से 2 ट्रक बालू मंदिर तक आनी थी जो एक दानदाता ने मंदिर के लिए निशुल्क दी थी जिसके लिए प्रशासन की अनुमति चाहिए थी जो केवल सांसद के अधिकार क्षेत्र की बात होती है । अतः हम भाजपा के स्थानीय सांसद श्री केशव प्रसाद मौर्य के पास गए जिनको हम लोगों ने मंदिर जीर्णोद्धार समिति की और से एक प्रार्थना पत्र दिया और मंदिर के कार्य के लिए उनके लेटर पैड पर लिखित अनुमति प्रशासन को संबोधित मांगी गई । हमारा प्रार्थना पात्र केशव प्रसाद मौर्य ने ले कर रख लिया और 2 दिन बाद बुलाया, हम 2 दिन बाद गए तो वो दिल्ली चले गए हमने फोन किया तो कहा की वो आएंगे तो काम करेंगें । आपको जानकर आश्चर्य होगा कि केवल इसी एक सामाजिक कार्य के लिए हम उस सांसद के आवास पर कम से कम 20 बार गए लेकिन उसने वो पत्र नही लिखा और अंततः मंदिर का निर्माण कार्य हुआ ही नही । बालू कुछ माह बाद मंदिर समिति ने खरीदी और वो कार्य किया ।
सांसद केशव प्रसाद मौर्य के द्वारा जनता के साथ कैसा व्यवहार किया जाता है वो भाजपा के अधिकांश सांसदों का जनता के विरुद्ध व्यवहार किये जाने का एक वास्तविक रूप है । केशव प्रसाद मौर्य जब अपने कार्यालय में आते हैं तो वो निचे - निचे नजरें रखकर पहले ये देखते हैं की कौन लोग पढ़े लिखे और बुद्धिजीवी हैं और प्रभावशाली हैं और कौन सीधे सादे गाँव के लोग हैं । जब चोर नजर से देखने पर उनको लोगों के स्टेट्स का पता चल जाता है तो वो पढ़े लिखे समझदार लोगों की और जाता ही नही अपितु उनको और उनकी बात को खुद को बहुत व्यस्त दर्शाकर अनसुना कर देता है, लेकिन वो इसी बीच बहुतायत में दूर ग्रामीण अंचलों से आये हुए लोगों को उलटी सीधी बाते बताकर या कुछ धमकाकर तेजी से कार्यालय से निकल जाता है। जब सांसद केशव प्रसाद मौर्य को फोन किया जाता है तो वो अपने आप को बहुत व्यस्त बताकर फोन 30 - 40 मिनट तक होल्ड करा देता है, जबकि वो वास्तव में इतना व्यस्त होता नही है, ये सांसद लोगों को फोन केवल इसलिए होल्ड कराता है जिससे उसको लोगों से बात न करनी पड़े,क्योंकि जब लोगों को फोन व्यस्त मिलता है तो उन्हें लगता है की सांसद व्यस्त है, और जिसका फोन होल्ड रहता है वो भी ऐसा ही सोचता है, अबतक में होता ये है कि किसी की समस्या का समाधान तो नही होता बस लोगों के 100 - 200 रुपये खर्च कराकर सांसद फोन काट देता है,अंततः लोग उसको परेशान होकर फोन करना ही बंद कर देते हैं और साथ ही भाजपा को वोट देना भी बंद कर देते हैं । मुझे सुचना है कि उसके जनता के साथ व्यवहार का यही मापदंड है और वो ऐसा ही करता है, और भाजपा की हार के बाद ये भी लगता है कि भाजपा के हर एक सांसद जनता के साथ ऐसा ही व्यवहार करते हैं । लगता है भाजपा के ये स्वार्थी सांसद हम लोगों की तपस्या के परिणाम को समाप्त कर ही देंगें ।
कुछ भी लिखने से पहले ये स्पष्ट करना आवश्यक है कि मै भाजपा या किसी अन्य राजनीतिक दल सदस्य नही हूँ, न प्राथमिक न पूर्ण कालिक, ये दिसंबर 2013 की बात है जब मेरे अनुभव के अनुसार उन लोगों ने देश में हाहाकार मचा रखा था जो आज असहिष्णुता और कट्टरपंथ के सबसे बड़े शिकार हैं, 2013 के कुछ ही समय पूर्व " लक्षित हिंसा विरोधी अधिनियम" की रूप रेखा संसद के बाहर के इन्ही लोगों ने तैयार करके सरकार के पास भेजा था जो आज पुरूस्कार लोटा रहें हैं । उस अधिनियम की पूरी रूप रेखा मैंने स्वयं पढ़ी थी ।
वास्तव में उस "लक्षित हिंसा विरोधी अधिनियम" को पढ़ने के बाद मैंने एक संकल्प लिया, कांग्रेस को नही रहना है, हम ये भी कह सकते हैं कि ऐसे ही संकल्प करोड़ों राष्ट्रवादियों ने लिए थे जिनकी परिणति कांग्रेस के न रहने के रूप में सिद्ध हुई । इसके बाद एक जानी मानी स्वयं सेवी संस्था के अपने कुछ मित्रों के सामने अपनी बात रखी और कहा कि "कांग्रेस को रहना चाहिए या नही" सभी ने मेरे ही संकल्प को दोहराया अर्थात "कांग्रेस को नही रहना है" और हमने अपनी रणनीति तैयार की, बस 3 दिन और लोकसभा चुनाव का ताना बाना तैयार ।
सबसे पहले हमने पुराने मतदाताओं के नामों में सुधार और नए नामों को जोड़ने के लिए कार्य प्रारम्भ किया, हमने इसको नाम दिया मतदाता अभियान, इसमें हम घर -घर मतदाता बनाने वाले फॉर्म पहुंचाने गए, और सभी नागरिकों से आग्रह किया कि ये फॉर्म भरकर अपने अपने बूथ स्तरीय अधिकारी को दे दें जिससे मतदाता पहचान पत्र बन सके । इस अभियान में सबसे बड़ी समस्या ये आई कि प्रदेश और देश में राज कर रही राजनीतिक पार्टियों को वैचारिक और बौद्धिक रूप से समर्थन करने वाले सरकारी कर्मचारियों ने जातिगत भेद के रंग दिखाते हुए अपनी जाति से बहार के लोगों के फॉर्म तो लेकर रख लेते थे लेकिन उनको जमा नही करते थे । इसका हमने विरोध और शिकायत भी की लेकिन लाभ नही हुआ ।
अब हमने अपनी रणनीति बदल दी, हमने लोगों के घर घर फिर से फॉर्म पहुंचाए और लोगों से प्रार्थना की कि ये फॉर्म मेरे कार्यालय में जमा करें । दूसरा काम हमने ये किया कि अपने व्यक्तिगत धन से एक नया प्रिंटर खरीदा, एक स्कैनर और लैपटॉप, और अतिरिक्त इंटरनेट कनेक्शन भी लिया और अपने कार्यालय में एक डाटा एंट्री ओपरेटर रखकर ओइनलाइन फॉर्म भरने की व्यवस्था करवाई । दिन में अपने कार्य समाप्त करने के बाद मै स्वयं भी रात में 10 से सुबह 4 बजे तक ओनलाइन फॉर्म भरता था ।
इस मतदाता अभियान में मेरे साथ मेरे 200 से अधिक सहयोगी मेरे नियंत्रण के 11 मतदान स्थलों पर स्वच्छिक सेवा दे रहे थे जिनमे मतदाताओं की अनुमानित संख्या लगभग 2.5 लाख है । जीवन में इस अभियान मेरे अध्ययन काल के बाद पहली बार मेरी इतनी व्यस्तता रही की लगभग 8 माह तक 20 - 20 घंटे लगातार कार्य किया फिर भी लोकसभा 2014 तक हमारा कार्य पूर्ण नही हुआ क्योंकि स्थानीय प्रशासन चुनाव आयोग के निर्देशों का खुला उल्लंघन कर रहा था और जो ओनलाइन फॉर्म भरे गए थे उनके मतदाता पहचान पत्र चुनाव तक 40 प्रतिशत ही बनाये गए, और ये जानबूझकर किया गया ये हम अच्छी तरह से जानते हैं ।
फिर भी हमारे निशुल्क अभियान का जनता पर बहुत प्यारा प्रभाव पड़ा और मेरे घर और कार्यालय पर भीड़ लगने लगी थी, लोगों में परिवर्तन की इतनी प्रबल इच्छा थी कि लोग पैसे देकर भी मतदाता पहचान पत्र बनवाने का दबाव डालते थे । मेरा चुनाव में लगभग 70,000 रुपया जेब से खर्च हुआ फिर भी हमने लोगों से उनके आग्रह के बाद भी एक रुपया तक नही लिया । जब मोदी जी चुनाव प्रचार में अपना "चाय पे चर्चा" कार्यक्रम लेकर आये तो इलाहाबाद शहर के आबकारी चौराहे पर एक कार्यक्रम मेरे द्वारा किये जाने के लिए मोदी जी के प्रचार का कार्य देख रही एक अन्य गैर सरकारी संस्था "सिटीजन फॉर एकाउंटेबल गवर्नेस" द्वारा प्रस्ताव दिया गया जिसे मैंने सहर्ष स्वीकार कर लिया । इस कार्यक्रम के लिए मुझे व्यय होने वाले धन की व्यवस्था उपरोक्त संस्था द्वारा किये जाने की बात हुई और कहा गया कि कार्यक्रम के 3 दिन बाद मुझे खर्च हुआ पैसा मिलेगा । लेकिन कहते हुए ग्लानि होती है कि कार्यक्रम समाप्त होने के बाद उपरोक्त संस्था ने बैंक एकाउंट माँगा और खर्च का ब्यौरा उनकी वेबसाइट पर मंगवाया जो मैंने भेज दिया । लेकिन अंत में हुआ ये कि पैसे तो मिले नही जिसका मुझे कोई दुःख नही है, मगर वो संस्था चुनाव होते ही मैदान छोड़कर भाग गई जिसके किसी कर्मचारी - अधिकारी ने उसके बाद आज तक मुझसे संपर्क नही किया, बस इसी बात का ज्यादा दुःख है की उस संस्था को भागने की आवश्यकता नही थी क्योंकि हमने धन के लिए ये कार्य नही किया था और आज भी ऐसे कार्य हम अपने ही धन से करते हैं आगे भी करते रहेंगें ।
इसके बाद चुनाव हुआ, वोट पड़े, ठीक चुनाव वाले दिन मेरे 200 से अधिक सहयोगी मित्र लगभग 160 बूथों पर बूथ प्रभारी के रूप में नियुक्त किये गए । कई मतदान स्थलों पर जहां भाजपा के कार्यकर्ता पोलिंग एजेंट(अभिकर्ता) के रूप में नियुक्त थे वो चाय - नाश्ता करके भाग गए तो मेरे ही सहमित्रों ने उनके स्थान पर कार्य किया । इस चुनाव में हमने आनंद भवन के अंदर रहने वाले कांग्रेस के कट्टर समर्थक तथा जवाहरलाल नेहरू के ड्राईवर की वर्तमान पीढ़ी तक के वोट भाजपा के पक्ष में डलवा दिए । इलाहाबाद में जहाँ 41 प्रतिशत वोटिंग हुई थी वहीँ मेरे बूथ संख्या 119 पर ये प्रतिशत 53 का रहा जो इलाहाबाद में सर्वोच्च था ।
अंत में लोकसभा के चुनाव का परिणाम आया, वो मोदी या भाजपा के कारण नही था अपितु हम जैसे करोड़ों निस्वार्थ राष्ट्रप्रेमियों के कारण था जिसके बारे में मोदी जी, अमित शाह या भाजपा को गलत फहमी है । चुनाव परिणाम के बाद आज तक भाजपा का कोई कार्यकर्ता, पदाधिकारी या समर्थक मेरा या मेरे सहमित्रों अथवा हम जैसे करोड़ों लोगों का हाल - चाल लेने नही आया, ये रहा भाजपा की दिल्ली और बिहार में हार का सबसे बड़ा कारण, और ऐसा ही उत्तर प्रदेश और अन्य राज्यों में भी होगा अगर इन्होंने अपने सहायकों की खोज खबर जल्दी नही ली तो ।
चुनाव के बाद भाजपा के स्थानीय सांसद ने जो व्यवहार किया उस पर भी एक नजर डाल लेते हैं, मेरे एक सहयोगी हैं श्री राकेश वर्मा, जो इलाहाबाद के कटरा मोहल्ले रहते हैं, उनके घर के सामने एक श्रीजगन्नाथ जी का मंदिर है जिसके एक हिस्से के निर्माण के लिए इलाहाबाद के बहार से 2 ट्रक बालू मंदिर तक आनी थी जो एक दानदाता ने मंदिर के लिए निशुल्क दी थी जिसके लिए प्रशासन की अनुमति चाहिए थी जो केवल सांसद के अधिकार क्षेत्र की बात होती है । अतः हम भाजपा के स्थानीय सांसद श्री केशव प्रसाद मौर्य के पास गए जिनको हम लोगों ने मंदिर जीर्णोद्धार समिति की और से एक प्रार्थना पत्र दिया और मंदिर के कार्य के लिए उनके लेटर पैड पर लिखित अनुमति प्रशासन को संबोधित मांगी गई । हमारा प्रार्थना पात्र केशव प्रसाद मौर्य ने ले कर रख लिया और 2 दिन बाद बुलाया, हम 2 दिन बाद गए तो वो दिल्ली चले गए हमने फोन किया तो कहा की वो आएंगे तो काम करेंगें । आपको जानकर आश्चर्य होगा कि केवल इसी एक सामाजिक कार्य के लिए हम उस सांसद के आवास पर कम से कम 20 बार गए लेकिन उसने वो पत्र नही लिखा और अंततः मंदिर का निर्माण कार्य हुआ ही नही । बालू कुछ माह बाद मंदिर समिति ने खरीदी और वो कार्य किया ।
सांसद केशव प्रसाद मौर्य के द्वारा जनता के साथ कैसा व्यवहार किया जाता है वो भाजपा के अधिकांश सांसदों का जनता के विरुद्ध व्यवहार किये जाने का एक वास्तविक रूप है । केशव प्रसाद मौर्य जब अपने कार्यालय में आते हैं तो वो निचे - निचे नजरें रखकर पहले ये देखते हैं की कौन लोग पढ़े लिखे और बुद्धिजीवी हैं और प्रभावशाली हैं और कौन सीधे सादे गाँव के लोग हैं । जब चोर नजर से देखने पर उनको लोगों के स्टेट्स का पता चल जाता है तो वो पढ़े लिखे समझदार लोगों की और जाता ही नही अपितु उनको और उनकी बात को खुद को बहुत व्यस्त दर्शाकर अनसुना कर देता है, लेकिन वो इसी बीच बहुतायत में दूर ग्रामीण अंचलों से आये हुए लोगों को उलटी सीधी बाते बताकर या कुछ धमकाकर तेजी से कार्यालय से निकल जाता है। जब सांसद केशव प्रसाद मौर्य को फोन किया जाता है तो वो अपने आप को बहुत व्यस्त बताकर फोन 30 - 40 मिनट तक होल्ड करा देता है, जबकि वो वास्तव में इतना व्यस्त होता नही है, ये सांसद लोगों को फोन केवल इसलिए होल्ड कराता है जिससे उसको लोगों से बात न करनी पड़े,क्योंकि जब लोगों को फोन व्यस्त मिलता है तो उन्हें लगता है की सांसद व्यस्त है, और जिसका फोन होल्ड रहता है वो भी ऐसा ही सोचता है, अबतक में होता ये है कि किसी की समस्या का समाधान तो नही होता बस लोगों के 100 - 200 रुपये खर्च कराकर सांसद फोन काट देता है,अंततः लोग उसको परेशान होकर फोन करना ही बंद कर देते हैं और साथ ही भाजपा को वोट देना भी बंद कर देते हैं । मुझे सुचना है कि उसके जनता के साथ व्यवहार का यही मापदंड है और वो ऐसा ही करता है, और भाजपा की हार के बाद ये भी लगता है कि भाजपा के हर एक सांसद जनता के साथ ऐसा ही व्यवहार करते हैं । लगता है भाजपा के ये स्वार्थी सांसद हम लोगों की तपस्या के परिणाम को समाप्त कर ही देंगें ।

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